स्थान और पहुँच

कोटेश्वर (निसरपुर)

जिले के अध्यात्मिक स्थल कोटेश्वर का अपना धार्मिक महत्व है, नर्मदा पुराण के अनुसार उरी-बाघनी-नर्मदा संगम तट पर स्थित इस तीर्थ पर ऋषि मार्कंडेय ने अपने 150 शिष्यों के साथ तपस्या की थी, जनश्रुति अनुसार यहाँ पर मेघनाद ने तपस्या कर भगवान शंकर को प्रसन्न किया था जिसके फलस्वरूप भगवान शंकर नर्मदा के मध्य स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए, इस प्रमाण की पुष्टि यहाँ नदी के मध्य स्थित मेघनाद महादेव से होती है जो कुछ वर्ष पूर्व ही सरदार सरोवर बांध के जलभराव के कारण जलमग्न हो गया ।

वर्तमान में कोटेश्वर तीर्थ स्थल पर होलकर राजघराने की महारानी अहिल्या बाई द्वारा बनवाया गया प्राचीन घाट अपने मूल रूप में है, इसके अतिरिक्त यहाँ पर पश्चिम दिशा में लगभग 1 करोड़ की लागत से जनसहयोग से  तैयार किया गया 500 मीटर का नवीन घाट भी है, जो नर्मदा पर बने बड़े घाटों में से एक है । इसी घाट का पूर्व दिशा में भी विस्तार किया जा रहा है ।
कोटेश्वर अपने घाटों के अतरिक्त नौका विहार, प्राचीन मंदिरों, संत आश्रमों, अन्नक्षेत्र और मुक्तिधाम के कारण आस्था का केंद्र है ।
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कोटेश्वर के प्रमुख दर्शनीय स्थल
कोट महादेव – कोटेश्वर का प्रमुख प्राचीन मंदिर है, भगवान शंकर के इस मंदिर को लेकर जनश्रुति है कि यहीं पर  ऋषि मार्कंडेय ने तपस्या की थी ।
श्री राम मंदिर (काँच मंदिर ) –  शासन द्वारा संधारित इस मंदिर में भगवान राम-सीता, लक्ष्मण और हनुमान की कलात्मक मुर्तियाँ है, इस मंदिर में काँच की खुबसूरत नक्काशी है जो देखते ही बनती है ।
नर्मदा मंदिर – नर्मदा नदी को हिन्दू धर्म मान्यता अनुसार देवी स्वरूपा माना है, इसी स्वरूप में यहाँ माता नर्मदा की मूर्ति हाथ में शिवलिंग लिए मगर पर सवार है ।
अखंड रामधुन अन्न क्षेत्र – संत श्री दगडू जी (दग्गा) महाराज द्वारा स्थापित इस आश्रम में विगत 15 वर्षों से 24 घंटे अनवरत रामधुन आज भी जारी है । इसी आश्रम के अन्नक्षेत्र में निराश्रित बुजुर्ग, महिलाओं और तीर्थ यात्रियों के लिए नि:शुल्क भोजन उपलब्ध है, निशुल्क भोजन हेतु राशि और अन्न की व्यवस्था क्षेत्र के किसानों और भक्तों द्वारा की जाती है ।
कनक बिहारी आश्रम – क्षेत्र के ब्रह्मलीन संत श्री १००८ श्री कमलदासजी द्वारा स्थापित इस आश्रम में लोगों की विशेष आस्था है, इस आश्रम में श्री सीताराम मंदिर शिवालय, संत श्री कमलदासजी की तपोभूमि व समाधी है । साथ ही आश्रम में एक आधुनिक गौ शाला भी है ।
कैसे पहुचें? – जिला मुख्यालय से कोटेश्वर की दुरी 125 किमी है । कोटेश्वर जाने के लिए खंडवा बड़ोदा राजमार्ग पर स्थित निसरपुर जाना होगा, निसरपुर के लिए जिला मुख्यालय से सीधी बसें है साथ ही बड़वानी और कुक्षी से हर आधे घंटे में निसरपुर की बसें है, निसरपुर विकासखंड मुख्यालय से कोटेश्वर जाने के लिए बस के अतिरिक्त मैजिक, वेन आदि वाहन उपलब्ध है ।
प्रमुख स्थानों से कोटेश्वर की अनुमानित दुरी-
धार 125 किमी
निसरपुर 5 किमी
कुक्षी 18 किमी
बड़वानी 21 किमी
अलीराजपुर 55 किमी
झाबुआ 115 किमी
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बाग की गुफाएं

धार जिले की कुक्षी तहसील में विंध्य पहाड़ी के दक्षिणी ढलानों के बीच नर्मदा घाटी में ये उल्लेखनीय और रोचक पाषाण मंदिर और मठ स्थित हैं । सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन मेघनगर से सड़क मार्ग से दुरी लगभग 82 किमी है । गुफाओं तक सड़क मार्ग से बस से पहुंचा जा सकता है । धार से ये लगभग 100 किमी दक्षिण-पश्चिम एवं कुक्षी से लगभग 18 किमी उत्तर में स्थित हैं ।

ये गुफाएं बौद्ध धर्म से संबंधित हैं और यह निश्चित नहीं है कि इन गुफाओं को कैसे एवं कब से बाग गुफा कहा जाने लगा । आधुनिक समय में इन गुफाओं को पहली बार 1818 ई. में खोजा गया था । ऐसा प्रतीत होता है कि 10 वीं सदी में मध्य भारत में बौद्ध धर्म के विलुप्त होने से इन गुफाओं को मानवीय याददाश्त से मिटा दिया । मध्यवर्ती सदियों के दौरान गुफाएं अक्सर बाघों का निवास बनीं और गुफाओं के साथ बाघों के इस संबंध ने उन्हें वर्तमान नाम दिया । गुफाएं एक छोटी पहाड़ी में खोदी गयी थी जिसके सामने से एक बाघेश्वरी नामक एक छोटी नदी बहती है । नौ गुफाओं में से चार (क्रमांक 2 से 5) को छोड़कर शेष समय के हाथों बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है । चार बेहतर संरक्षित गुफाओं में से द्वितीय गुफा का ढांचा सबसे विस्तृत है जिसे स्थानीय रूप से गोंसाई गुफा या पांडवों की गुफा कहा जाता है । इस चट्टान-मंदिर के केंद्र में एक बड़ा मठवासी कक्ष है । एक भव्य छह स्तंभों वाले बरामदे से इसका अग्रमुख सुशोभित है । केंद्र के पीछे विशाल गोपनीय कक्ष में एक स्तुप प्रतिष्ठापित है जो तत्समय भिक्षुओं को पवित्र ध्यान के लिए आवश्यक एकांतता एवं वातावरण प्रदान करता था । केन्द्रीय कक्ष को सर्पिल धारियों से सज्जित विशाल स्तंभों से सहारा दिया गया है जो कि प्रार्थना गृह के उद्देश्य की प्रतिपूर्ति करता था । यहाँ बौद्ध भिक्षु प्रार्थना एवं धार्मिक संभाषण के लिए एकत्रित होते थे । गुफा एक चैत्य (प्रार्थना गृह) और विहार (निवास) का एक संयोजन था ।

गुफा क्रमांक 3 को छोड़कर, जो कि शुद्ध रूप से एक विहार या मठ है जिसे स्थानीय रूप से हाथी खाना‘ कहा जाता है; शेष सभी गुफाएँ ढाँचागत रूप से कुछ संशोधनों को छोड़कर लगभग एक जैसी हैं । इसकी बहुत स्पष्ट रूप से नक्काशी और बनावट की गई थी । चौथी गुफा श्रंखला में सबसे बड़ी है । स्थानीय लोग इसे रंगमहल कहते हैं । कई मायनों में यह सबसे उल्लेखनीय गुफा है । इसमें 3 प्रवेश द्वार एवं 2 खिड़कियाँ है । मुख्य द्वारा सबसे आकर्षक एवं अच्छी तरह से तैयार किया गया है । कक्ष की छत को 28 स्तंभों से सहारा दिया गया है जो की आधार से चोकोर एवं फिर कुछ अष्टकोणाकार फिर बहुकोनाकर व पुनः छत से मिलाप पर अष्टकोणाकार हैं । गुफा क्रमांक 5 स्पष्ट रूप से न तो चैत्य है न ही विहार । इसके आकार एवं व्यवस्था के आधार पर यह व्याख्यान कक्ष प्रतीत होता है जिसे स्थानीय लोग पाठशाला कहते हैं । इसमें कोई गलियारे, कक्ष, स्तूप या चित्र नहीं है एवं यह पूर्णतः सपाट होकर सज्जा रहित है ।

बाग गुफाओं के चित्र अजंता के समकालीन हैं एवं दोनों ऐसे विद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ की कला पर सिर्फ भारत या दक्षिण-पूर्व के देशों एवं चीन का प्रभाव नहीं है अपितु उस प्रत्येक देश का गहरा प्रभाव है जहाँ बौद्ध धर्म का विस्तार था । कहा जाता है कि इन चित्रों की तुलना माइकल एंजेलो के समय तक यूरोप के सर्वश्रेष्ठ चित्रों से की जा सकती है ।

माहिष्मती के राजा सुबंधु का एक शिलालेख इन गुफाओं से प्राप्त हुआ है । शिलालेखीय उद्धरणों से पता लगता है कि इस विहार का नाम कल्याण था । महाराजा सुबंधु ने विहार के रखरखाव एवं इसमें रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं संरक्षण हेतु दासिलक पट्टी के गांवों को दान दे दिया था । महाराजा द्वारा गाँव के लोगों एवं अधिकारीयों को बौद्ध भिक्षुओं को सहयोग करने एवं उन्हें निर्बाध रूप से अपना काम करने देने हेतु आदेशित किया गया था ।

धार

धार मध्यप्रदेश का एक जिला है एवं धार नगर इसका मुख्यालय है । यहाँ तक सिर्फ सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है । सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन इंदौर है जो कि सड़क मार्ग से लगभग 60 किमी की दुरी पर है । इसके अतिरिक्त संलग्न जिलों रतलाम एवं झाबुआ से लगभग 90 कीमी, अलीराजपुर से लगभग 150 किमी एवं बड़वानी से लगभग 115 किमी की दुरी पर है । धार नगर में ऐतिहासिक महत्व के कई स्थल एवं स्मारक स्थित हैं ।

भोजशाला

राजा भोज (1000-1055 ई.) परमार राजवंश के सबसे बड़े शासक, जो शिक्षा एवं साहित्य के अनन्य उपासक थे, ने धार में एक महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में भोजशाला के रूप में जाना जाने लगा, जहां दूर और पास के अनेक छात्र अपनी बौद्धिक प्यास बुझाने के लिए आते थे ।

इस भोजशाला या सरस्वती मंदिर, जिसे बाद में यहाँ के मुस्लिम शासक ने मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था, के अवशेष अभी भी प्रसिद्ध कमाल मौलाना मस्जिद में देखे जा सकते हैं । मस्जिद में एक बड़ा खुला प्रांगण है जिसके चारों ओर स्तंभों से सज्जित एक बरामदा एवं पीछे पश्चिम में एक प्रार्थना गृह स्थित है । मस्जिद में प्रयुक्त नक्काशीदार स्तम्भ और प्रार्थना कक्ष की उत्कृष्ट रूप से नक्काशीदार छत भोजशाल के थे । मस्जिद की दीवारों में लगी शिलाओं पर उत्कीर्ण मूल्यवान रचनाएं पुनर्प्राप्त की गई हैं ।

इन शिलाओं में कर्मावतार या विष्णु के मगरमच्छ अवतार के प्राकृत भाषा में लिखित दो स्तोत्र उत्कीर्ण हैं । दो सर्पबंध स्तंभ शिलालेख, जिसमें एक पर संस्कृत वर्णमाला और संज्ञाओं और क्रियाओं के मुख्य अंतःकरण को समाहित किया गया है और दूसरे शिलालेख पर संस्कृत व्याकरण के दस काल और मनोदशाओं के व्यक्तिगत अवसान शामिल हैं । ये शिलालेख 11 वीं-12 वीं शताब्दी के हैं । इसके ऊपर संस्कृत के दो पाठ अनुस्तुभ छंद में उत्कीर्ण हैं । इनमें से एक में राजा भोज के उत्तराधिकारी उदयादित्य एवं नरवरमान की स्तुति की गयी है । द्वितीय लेख में बताया गया है कि ये स्तम्भ लेख उदयादित्य द्वारा स्थापित करवाए गए हैं । इसमें कोई संशय नहीं है कि यहाँ राजा भोज का महाविद्यालय या सरस्वती मंदिर था जिसे उनके उत्तराधिकारियों द्वारा विकसित किया गया था।

करीबी अन्वेषण और निरीक्षण से यह तथ्य प्रकाश में आया है कि मेहराब की परतों का निर्माण करने वाले दो बड़े काले पत्थरों के पीछे की तरफ के भाग पर लेख उत्कीर्ण है । ये शिलालेख शास्त्रीय संस्कृत में नाटकीय रचना हैं । यह अर्जुनवर्मा देव के शासनकाल (1299-10 से 1215-18 ई.) के दौरान उत्कीर्ण किया गया था । यह नाटक राजकीय शिक्षक मदन द्वारा काव्य रूप में लिखा गया था, जो कि प्रसिद्ध जैन विद्वान आशाधर के शिष्य थे जिन्होंने स्वयं भी परमारों की शाही अदालत को सुशोभित किया और मदन को संस्कृत काव्य पढ़ाया । नाटक को करपुरमंजरी कहा जाता है एवं यह अर्जुनवर्मा देव के सम्मान में है जिन्हें मदन ने पढ़ाया था और जिनकी अदालत को वे शोभायमान करते थे । यह नाटक परमारों और चालुक्यों के बीच युद्ध को संदर्भित करता है जो विवाह गठबंधन द्वारा समाप्त हो गया था ।

“धार में, जिसे महलों का शहर के रूप में वर्णित किया गया है जिसमें आसपास फैली पहाड़ियों पर खुबसुरत उद्यान थे, तत्समय के उच्च स्तरीय नागरिक जीवन एवं सुधारात्मक कार्यों की एक झलक प्रस्तुत की गयी है । लोग स्वयं भोज की महिमा पर गर्व करते थे जिन्होंने धार को ‘मालवा की रानी’ के रूप में बनाया था ।” धार के संगीतकारों और विद्वानों की उत्कृष्टता का भी उल्लेख किया गया है । यह शाला, जिसकी भोज द्वारा स्थापना की गयी और उनके उत्तराधिकारियों द्वारा संरक्षित किया गया, इसे 14 वीं सदी में एक मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया ।

यह मूल रूप से सरस्वती (विद्या की देवी) का मंदिर थी, जो कवि मदन ने उनके नाटक में संदर्भित किया है । मंदिर को; महलों, मंदिरों, महाविद्यालयों, नाट्यशालाओं और उद्यानों के नगर – धारानगरी के 84 चौराहों का आभूषण कहा जाता था । देवी सरस्वती की प्रतिमा वर्तमान में लंदन के संग्रहालय में है । धार के कलाकारों द्वारा मूल प्रतिमा की तरह दिखने वाला चित्र उकेरा गया है ।

धार का किला

धार का किला, लाल बलुआ पत्थर का एक आयताकार निर्माण है जिसके निर्माण का श्रेय दिल्ली के सुल्तान महमूद तुगलक को जाता है । इसका निर्माण 1344 ई. में किया गया था जब महमूद तुगलक दक्कन विजय के अभियान पर था । इसमें 15 वीं एवं 16 वीं शताब्दी के भवनों के अवशेष मौजूद हैं । पेशवा बाजीराव द्वितीय का जन्म 1775 ई. में इसी किले में हुआ था । 1857 में किले पर रोहिला ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आन्दोलन कर कब्ज़ा कर लिया था जिसे ब्रिटिशों ने छः दिनों तक बमबारी कर पुनः अपने नियंत्रण में ले लिया था । किले के तीसरे द्वार पर औरंगजेब के शासनकाल एवं शाहजहां के सौतेले भाई अशर बेग के प्रशासन के दौरान का एक शिलालेख मौजूद है ।

फड़के स्टूडियो

शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध फड़के आर्ट स्टूडियो धार नगर में माण्डव रोड़ पर शासकीय भोज चिकित्सालय के नजदीक खांडेराव टेकरी पर स्थित है । इसकी स्थापना पद्मश्री से सम्मानित श्री रघुनाथ कृष्ण फड़के द्वारा की गयी थी । श्री फड़के धार महाराज के बुलावे पर कला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मुंबई से धार आये थे । उनके द्वारा सन् 1933 में यह आर्ट स्टूडियो स्थापित किया गया था जिसमें उनकी शिल्पकला को संगृहीत किया गया है । श्री फड़के द्वारा अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों – गाँधीजी, जवाहरलाल नेहरु, बाल गंगाधर तिलक, राजा राममोहन राय आदि की अत्यंत ही जीवंत प्रतिमाएँ बनाई गयी थी । इसके अतिरिक्त राजा-महाराजाओं, रानियों, स्थानीय संतों की अत्यंत सुंदर प्रतिमाएँ उकेरी गयी थी । उनकी प्रतिमाएँ धार, देवास, इंदौर, उज्जैन, मुंबई आदि स्थानों पर लगायी गयी हैं । फड़के स्टूडियो में श्री फड़के की मूल कलाकृतियाँ एवं भारतवर्ष में विभिन्न स्थलों पर स्थापित उनकी कलाकृतियों के प्रतिरूप मौजूद हैं । श्री फड़के को कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1961 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया । सन् 1971 में उज्जैन स्थित विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गयी । सन् 1972 में श्री फड़के के देहावसान उपरांत आज भी उनकी कलाकृतियाँ फड़के स्टूडियो में जीवित है । जिला प्रशासन द्वारा हाल ही में इस सुप्रसिद्ध शिल्पकला संग्रहालय का जीर्णोद्धार सीएसआर द्वारा करवाया गया है ।

नित्यानंद आश्रम

धार नगर में स्थित नित्यानंद आश्रम अवधूत संत श्री नित्यानंद बापजी का समाधि स्थल एवं आश्रम है । यह पुराने इंदौर-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर कालिका मंदिर के सामने देवीसागर तालाब के किनारे स्थित है । यहाँ नित्यानंद बापजी के शिष्य श्री लक्ष्मीकांत बापजी का भी समाधि स्थल स्थित है । इसके अतिरिक्त काँच मंदिर, नित्यानंद बापजी की कुटिया, गायत्री मंदिर, राजानंद बापजी का मंदिर, संत एवं भक्त मंदिर, गौशाला आदि भी दर्शनीय है । आश्रम नगर के कोलाहल से दूर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण एवं रमणीय है । आश्रम के शुद्ध एवं नीरव वातावरण में जाकर भक्त अंदरूनी शांति को प्राप्त करते हैं एवं सकारात्मक उर्जा से परिपूर्ण हो जाते हैं । प्रतिदिन होने वाली आरती एवं शिवधुन अंतर्मन को परम शक्तिशाली ईश्वर के नजदीक होने का आभास करवाती है । प्रतिवर्ष गुरुपूर्णिमा एवं दशहरे को महाप्रसादी एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें सम्पूर्ण नगरवासी एवं अन्य राज्यों से भी भक्तजन सम्मिलित होते हैं |

धारेश्वर मंदिर

धार का यह अतिप्राचीन शिव मंदिर आमजन की आस्था एवं श्रद्धा का केंद्र है । इन्हें धार के ईश्वर अर्थात् धारेश्वर, धारनाथ आदि नामों से संबोधित किया जाता है । धारेश्वर महादेव परमार कालीन राजाओं के आराध्यदेव रहे हैं । कहा जाता है कि यह मंदिर राजा भोज के काल का है । धारेश्वर मंदिर का हजारों वर्षों से ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व रहा है । धारेश्वर महादेव धार के राजा कहलाते हैं । प्रतिवर्ष सावन माह में भक्त दूर-दराज से महादेव के दर्शन को आते हैं एवं मंदिर हर हर महादेव एवं बोल बम के नारों से गुंजायमान रहता है । सावन माह में भगवान धारनाथ प्रजा के हाल जानने नगर भ्रमण पर भव्य छबीने के रूप में निकलते हैं । यह परंपरा राजा भोज के समय से चली आ रही है एवं राजा भोज स्वयं भी इस पालकी यात्रा में पैदल चलते थे । यह मंदिर नगर के धारेश्वर मार्ग पर स्थित है एवं सम्पूर्ण वर्ष दर्शन के लिए खुला रहता है ।

कालिका मंदिर

यद्यपि जो ईमारत वर्तमान में खड़ी है पुरातन नहीं है, किन्तु यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है । इसका निर्माण परमार वंश के राजा मुंज (973, 997-98 ई.) द्वारा करवाया माना जाता है । कालिका परमारों की संरक्षक देवी मानी जाती है । यह मंदिर धार के उत्तर-पश्चिम में पुराने इंदौर-अहमदाबाद मार्ग पर तालाब के सामने पहाड़ी पर स्थित है । कहा जाता है कि मुस्लिमों के मालवा पर आक्रमण के दौरान देवी की प्रतिमा को हटाकर छुपा दिया गया था, जिससे इसे विनाश से बचा लिया गया । प्रतिवर्ष नवरात्री पर मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं एवं माता कालिका के दर्शन करते हैं । नवरात्री में मंदिर को लाइट्स से सजाया जाता है एवं यह अत्यंत ही सुन्दर एवं आकर्षक प्रतीत होता है ।

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लाल बाग

लाल बाग धार नगर के मध्य घोड़ा चौपाटी पर स्थित उद्यान है । इसमें बच्चों के लिए अनेक तरह के झूले, फिसलपट्टियाँ, डायनासोर की प्रतिकृति आदि मौजूद हैं । बाग में सुन्दर पेड़ पौधे लगाये गए हैं । नागरिक अपने परिवार एवं बच्चों के साथ सुबह एवं शाम को बाग में विचरण करने आते हैं । लाल बाग में बच्चे घोड़े एवं ऊँट की सवारी भी कर सकते हैं । किन्तु लाल बाग का प्रमुख आकर्षण बच्चों की रेलगाड़ी है जिसमें बैठने के लिए बच्चों की काफी भीड़ जमा होती है । बाग के बाहर सड़क किनारे अनेक नाश्ते की गुमटियाँ लगती हैं जहां लोग शाम को नाश्ता करने आते हैं ।

जल महल सादलपुर (धार)

धार जिले का यह प्राचीन महल जिसे ‘जल महल’ के नाम से जाना जाता है महू-नीमच रोड पर धार जिला मुख्यालय से लगभग 28 किमी उत्तर-पूर्व में सादलपुर ग्राम में स्थित है । यह महल माण्डव के सुल्तान नासिर-उद-दीन खिलजी (1500-1512 ई.) से सम्बद्ध है । महल के एक स्तम्भ पर अंकित लेख अनुसार 1589 ई. में अकबर के दक्कन प्रस्थान के दौरान यहाँ ठहरने का उल्लेख मिलता है । जैन एवं वैष्णव मंदिरों एवं बावड़ियों के भी साक्ष्य मिलते हैं ।

मोहन खेड़ा (राजगढ़)

मोहन खेड़ा मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक श्वेतामबर जैन तीर्थ है । यह इंदौर से 105 किलोमीटर (65 मील) और धार से 47 किमी (29 मील) की दूरी पर इंदौर-अहमदाबाद राजमार्ग पर स्थित है । इसे आचार्य राजेंद्रसूरी (1826-1906) द्वारा 1884 के आस-पास स्थापित किया गया था और आज एक महत्वपूर्ण ज्ञानक्षेत्र या सीखने का केंद्र है । इस तीर्थ में पहले तीर्थंकर की कमल की स्थिति में 16 फीट लंबी (4.9 मीटर) प्रतिमा है और आचार्य राजेंद्रसूरी, यतिन्द्रसूरी और विद्याचंद्रसूरी का समाधि स्थान है । कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा, चैत्र माह, और पौष माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी पर एक मेला आयोजित किया जाता है ।

भोपावर

सरदारपुर तहसील का भोपावर एक छोटा सा गाँव है जो सरदारपुर से 9 किमी दक्षिण में स्थित है एवं धार से यह लगभग 40 किमी दूर है । भोपावर 16 वें जैन तीर्थंकर शांतिनाथजी के विशाल मंदिर के लिये प्रसिद्ध है । यहाँ स्थापित प्रतिमा के 87 हज़ार वर्ष पुराने होने का दावा किया जाता है । यह जैनों का पवित्र तीर्थ है । प्रतिवर्ष पौष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी को यहाँ मेले का आयोजन होता है जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं । भोपावर तक केवल सड़क मार्ग से ही पहुंचा जा सकता है । धार एवं सरदारपुर से भोपावर के लिए बस उपलब्ध हैं ।

अमझेरा

सरदारपुर तहसील का अमझेरा गाँव सरदारपुर के दक्षिण-पूर्व में लगभग 23 किमी एवं धार से उत्तर-पश्चिम में लगभग 27 किमी की दुरी पर स्थित है । तीनों स्थान सड़क मार्ग से आपस में जुड़े हैं एवं बस से आवागमन होता है । अमझेरा का यहाँ स्थित शैव एवं वैष्णव मंदिरों, तालाबों, छत्रियों, कुओं, एक मस्जिद एवं किले के कारण प्राचीन काल से महत्व रहा है । यहाँ महादेव, चामुण्डा एवं अम्बिका माता के 5 शैव मंदिर तथा लक्ष्मीनारायण एवं चतुर्भुजनाथ के 2 वैष्णव मंदिर स्थित हैं ।

अमका झमका मंदिर

यह गाँव का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है । मंदिर माता अमका झमका को समर्पित है । नवरात्री के दौरान यहाँ मेले का आयोजन होता है एवं ग्रामीणजन गरबा कर देवी की आराधना करते हैं । मंदिर के पीछे पाण्डव कालीन एक गुफा भी स्थित है ।

अमझेरा का किला

अमझेरा के किले का निर्माण संभवतः जोधपुर के राजा रामसिंह राठौर द्वारा 18-19 वीं शताब्दी में पत्थरों एवं ईंटों से करवाया था । किले में उसी काल के 3 महल भी स्थित हैं । इनमें से सिर्फ सिर्फ रंग महल ही उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें तत्कालीन जीवन के भित्ति चित्र उत्केरित हैं । किले पर 1857 में राजा भक्तावर सिंह द्वारा कब्जा किया गया । राजा भक्तावर सिंह ने 1857 की महान क्रांति के दौरान अंग्रेजों का अत्यंत साहस से विद्रोह किया था, अंग्रेज अधिकारीयों द्वारा राजा को पकड़कर इंदौर में मृत्युदण्ड दे दिया गया । किन्तु राजा ने अपने अमर बलिदान से अमझेरा गाँव का नाम इतिहास के पन्नों में सदैव के लिए अमर कर दिया ।

जिरापुरा (नालछा)

नालछा विकासखंड मुख्यालय से लगभग 4 किमी दूर जिरापुरा ग्राम स्थित है । धार से इसकी दुरी लगभग 20 किमी है । जिरापुरा चौसठ योगिनी माता एवं बावन भैरव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है । यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र माह में नवरात्री के दौरान मेले का आयोजन होता है । मेले में अनेक श्रद्धालु माताजी के दर्शन के लिए आते हैं । विशेषकर निमाड़ क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होते हैं । माना जाता है कि नवरात्री में मंदिर के सामने स्थित तालाब में स्नान करने से समस्त प्रकार के रोगों का नाश होता है । इस तालाब से मान नदी का भी उद्गम हुआ है । जिरापुरा जाने के लिए लुन्हेरा तक बस से पहुंचा जा सकता है एवं वहाँ से पैदल अथवा स्थानीय साधनों से जा सकते हैं ।

गंगा महादेव (तिरला)

तिरला विकासखंड के सुल्तानपुर गाँव में गंगा महादेव मंदिर स्थित है जो काफी प्रसिद्ध है । यहाँ प्रत्येक शिव रात्रि को मेले का आयोजन होता है जिसमें ग्रामीण जन एवं दर्शनार्थी दूर-दूर से शिव दर्शन एवं मेले का लुफ्त उठाने आते हैं । गंगा महादेव में सुन्दर झरना बहता है जो स्थान के प्राकृतिक सौन्दर्य को बढ़ा देता है । गंगा महादेव धार से लगभग 15 किमी दूर स्थित है, यहाँ पहुँचने के लिए ग्राम बोधवाड़ा तक बस से एवं वहाँ से स्थानीय साधनों से जा सकते हैं अथवा स्वयं के वाहन से पहुँच सकते हैं ।

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